नई दिल्ली। भारत में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन जॉब मार्केट में उनकी उपस्थिति कम होती जा रही है। इस समस्या को विशेषज्ञ “लीकी पाइपलाइन” कहते हैं, जहाँ पढ़ाई और नौकरी के बीच एक बड़ी संख्या में महिलाएं करियर छोड़ देती हैं और फिर वापस भी नहीं आतीं।
शिक्षा मंत्रालय और विभिन्न अनुसंधान संस्थानों के आंकड़ों के मुताबिक, इंजीनियरिंग कॉलेजों में महिलाओं का प्रतिशत करीब 30-40% है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी 20% से भी कम हो जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि जहां महिलाएं तकनीकी क्षेत्रों में प्रवेश कर रही हैं, वहीं दीर्घकालिक रोजगार में उनकी बनी रहने की दर बहुत कम है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस समस्या के कई कारण हैं। सबसे पहला कारण सामाजिक और पारिवारिक दबाव है, जो महिलाओं को करियर छोड़ने पर मजबूर कर देता है। कई बार उन्हें घर की जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं या विवाह और बच्चों के बाद कार्यस्थल में लौटने का समय नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त, कार्यस्थलों पर लैंगिक भेदभाव, असमान वेतन और उठाए जाने वाले पदों में कमी जैसी समस्याएं भी महिलाओं को पीछे हटने पर मजबूर करती हैं।
इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने कुछ विशेष योजनाएं शुरू की हैं, जैसे महिला फाउंडेशन, कार्य स्थल पर लैंगिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण और कार्य-जीवन संतुलन को बढ़ावा देना, ताकि महिलाएं इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बने रहें। उद्योगों को भी चाहिए कि वे लचीले कार्य समय और पर्यावरण तैयार करें जिससे महिलाएं अपने करियर को जारी रख सकें।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि शैक्षिक संस्थान और कंपनियां मिलकर महिला तकनीशियनों के लिए मेंटरशिप प्रोग्राम, कौशल विकास और करियर काउंसलिंग पर जोर दें। इससे महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे अपने करियर को लंबे समय तक बनाए रख पाएंगी।
लीकी पाइपलाइन की समस्या दूर करना न केवल महिलाओं के लिए बल्कि देश की तकनीकी प्रगति के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। जितनी अधिक महिलाएं इंजीनियरिंग क्षेत्र में सक्रिय होंगी, उतनी ही विविधता, नवाचार और उत्पादकता में वृद्धि संभव होगी।














