भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने हाल ही में प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के लिए नए परिसंपत्ति मानदंडों को परिभाषित किया है। केंद्रीय बैंक ने ऊपरी परत की कंपनियों के लिए परिसंपत्ति की नई सीमा ₹1 लाख करोड़ निर्धारित की है। यह कदम उद्योग की मांग के विरुद्ध है जहां उच्च सीमा की संभावना पर विचार किया जा रहा था। इस निर्णय से उन कंपनियों के लिए सार्वजनिक सूचीबद्धता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, जिनमें टाटा संस जैसे बड़े व्यवसाय समूह शामिल हैं।
आरबीआई इस सूची को प्रति वर्ष अपडेट करेगा, जिसके तहत इन कंपनियों की पहचान की जाएगी। इसके परिणामस्वरूप, इन संस्थानों की निगरानी और नियंत्रण भी सख्त होने की संभावना है। ऐसी कंपनियां अब आरबीआई की नीतियों के अधीन अधिक नियमात्मक दबाव में आ सकती हैं और उनके कॉर्पोरेट गवर्नेंस में भी बदलाव आ सकता है।
विशेषज्ञों के मतानुसार, इस कदम से वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी और बड़े समूहों के नियंत्रण संरचनाओं में सुधार संभव होगा। रुग्ण एनबीएफसी सेक्टर में स्थिरता भी बढ़ने की संभावना है क्योंकि नियमों के तहत अधिक जवाबदेही आएगी। टाटा संस जैसे केन्द्रीय औद्योगिक समूहों के लिए सार्वजनिक सूचीबद्धता चुनौतियां लाएगी लेकिन साथ ही वित्तीय प्रदर्शन पर बाजार की निगरानी और जागरूकता में सुधार करेगी।
एनबीएफसी-UL (ऊपरी परत) का परिसंपत्ति आधार बढ़ाकर ₹1 लाख करोड़ तय करना आरबीआई की सख्त नियामक नीति को प्रदर्शित करता है। इससे भारतीय गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में नियंत्रण और जोखिम प्रबंधन के स्तर में सुधार आएगा। इससे पहले उद्योग की मांग थी कि परिसंपत्ति सीमा को उच्च रखा जाए ताकि सार्वजनिक सूचीबद्धता से बचा जा सके, लेकिन रिजर्व बैंक ने इसे अस्वीकार कर दिया।
इस नीति के तहत, जिन कंपनियों की परिसंपत्ति ₹1 लाख करोड़ से अधिक होगी, उन्हें निम्नलिखित आवश्यकताओं का पालन करना होगा:
- ज्ञात वित्तीय जानकारी की सार्वजनिक रूप से उपलब्धता
- मजबूत कॉर्पोरेट और फाइनेंशियल गवर्नेंस
- वार्षिक जांच और नियामकीय रिपोर्टिंग में वृद्धि
आरबीआई के इस निर्णय से भारतीय गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में नई पारदर्शिता और नियामकीय स्थिरता की उम्मीद है, जो निवेशकों और आर्थिक प्रणाली दोनों के लिए लाभकारी होगी।













