निदेशक अहमद खान की नई फिल्म ‘वेलकम टू द जंगल’ एक ऐसी मेटा-कॉमेडी है जो दर्शकों से पूर्ण बौद्धिक समर्पण की मांग करती है। फिल्म में कई हास्यप्रद क्षण जरूर हैं, लेकिन इसका प्लॉट इतने पेचीदा और उलझन भरा है कि दर्शक इसे समझने में कंफ्यूज हो सकते हैं।
अक्षय कुमार और जॉनी लीवर जैसे अनुभवी कलाकारों ने अपनी अदाकारी से कहानी को कुछ हद तक संभाला है, परंतु पटकथा का कमजोर ढांचा पूरी फिल्म को प्रभावित करता है। फिल्म का शीर्षक जंगल की याद दिलाता है, पर निर्देशक जंगल के बीच पेड़ों को देखने में इतना उलझ गए कि मूल कहानी कहीं खो सी गई है।
फिल्म की कहानी कई स्तरों पर जाती है, जहां न केवल मनोरंजन बल्कि गहरी सोच भी शामिल है। इस मेटा-कॉमेडी के जरिये निर्देशक ने फिल्मों की जटिलताओं और पर्दे के पीछे की दुनिया को दर्शाने की कोशिश की है। हालांकि यह विचार सराहनीय है, लेकिन इसे प्रस्तुत करने का तरीका दर्शकों तक अच्छी तरह नहीं पहुंच पाया।
तकनीकी दृष्टि से फिल्म में सिनेमैटोग्राफी और गाने कुछ हद तक फिल्म को जीवंत बनाते हैं। लेकिन इसकी गति कई बार सुस्त होकर दर्शकों की रुचि को कम कर देती है। संवादों में हास्य का तड़का होता है, फिर भी कहानी के कमजोर हिस्से इसे पैर नहीं पकड़ने देते।
अगर आप एक लाइट कॉमिक फिल्म देखना चाहते हैं जो आपको सोचने पर मजबूर करे, तो ‘वेलकम टू द जंगल’ एक बार देखने लायक है। पर यदि आप साफ-सुथरी लाइन में चलने वाली मनोरंजक कहानी की उम्मीद करते हैं, तो यह फिल्म आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी।
कुल मिलाकर, ‘वेलकम टू द जंगल’ एक प्रयास है जिसका अंत भले ही मिश्रित प्रभाव छोड़े, पर इसमें दर्शकों के लिए कुछ मनोरंजक पल और सशक्त अभिनय देखने को मिलता है। अक्षय कुमार और जॉनी लीवर का प्रदर्शन फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है, जो कहानी की कमजोरियों को कुछ हद तक कम करता है।















