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‘झुमकेवाली’ लेकर आ रही है बेंगलुरु में पहली मोहब्बत की नशेड़ी खुशी

‘Jhumkewali’ brings the giddy joy of first love to Bengaluru

बेंगलुरु में ‘झुमकेवाली’ का रंगीन आगाज, मुंबई की हाउस ऑफ भाउस की ग्लैमरस प्रस्तुति

बेंगलुरु, 2024 – मुंबई की चर्चित थिएटर कंपनी हाउस ऑफ भाउस का नया क queer retro रोमांस ‘झुमकेवाली’ इस सप्ताहांत बेंगलुरु में अपनी पहली प्रस्तुति के साथ सामने आ रहा है। यह नाटक न केवल मुंबई, बल्कि पूरे देश में LGBTQ समुदाय की कहानियों को एक नए दृष्टिकोण से पेश करने का प्रयास करता है।

‘झुमकेवाली’ की कहानी 1980 और 90 के दशक की भूमिगत संगीत एवं फैशन संस्कृति से प्रेरित एक रंगीन प्रेमकथा है, जो पुराने जमाने के स्टाइल को आधुनिक युवाओं की जिंदादिली से जोड़ती है। मुख्य किरदारों की जटिल भावनाएँ और नाजुक रिश्ते दर्शकों को बांधे रखते हैं, जो पहली बार ऐसे विषय को नाटकीय शैली में इतने खुले रूप में पेश किया गया है।

हाउस ऑफ भाउस के निर्देशक रमिता शर्मा ने बताया, “हमारी कोशिश थी कि हम ऑन-स्क्रीन और थियेटर दोनों माध्यमों के लिए ऐसी कहानी तैयार करें जो सिर्फ मनोरंजन न करे, बल्कि समाज के समझ और स्वीकार्यता के दायरे को बढ़ाए। ‘झुमकेवाली’ की कथानक में न केवल queer समुदाय की जटिलताओं को प्रामाणिक रूप से दिखाया गया है, बल्कि यह एक ऐसा संदेश भी देती है जो हरेक दर्शक से जुड़ता है – प्यार और खुशनुमा जीवन का जश्न।”

इस नाटक की खासियत इसकी रंगीन रेट्रो सेटिंग, जीवंत संगीत और प्रचलित फैशन है, जो 80 के दशक के मुंबई शहरी जीवन की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है। साथ ही, कलाकारों की बेहतरीन अभिनय क्षमता ने इसे एक संवेदनशील और आकर्षक अनुभव बनाया है।

इस सप्ताहांत बेंगलुरु के रंगभूमि थियेटर में ‘झुमकेवाली’ की शुरुआत दर्शकों ने उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दी है। दर्शक इस नाटक की प्रामाणिकता, नाटकीयता और सामाजिक सन्देश की तारीफ कर रहे हैं। आयोजकों का कहना है कि वे आगामी हफ्तों में अन्य शहरों में भी इस नाटक को प्रस्तुत करने की योजना बना रहे हैं।

इस प्रस्तुति ने न केवल युवा दर्शकों को प्रभावित किया है, बल्कि प्रतिष्ठित साहित्य एवं कला समीक्षकों से भी सकारात्मक समीक्षा प्राप्त की है, जो हिंदी रंगमंच में LGBTQ कहानियों की बढ़ती महत्ता को दर्शाती है।

‘झुमकेवाली’ न केवल एक नाटक है, बल्कि यह प्रेम और स्वीकृति का एक जश्न है जो आज के समाज में आवश्यक है। ऐसी प्रस्तुतियाँ समाज में समावेशन और सहिष्णुता के लिए एक मजबूत संदेश हैं, जो आने वाले वर्षों में अधिक खुलापन और साझा समझ को बढ़ावा देंगी।

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