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धरती का सबसे बड़ा महाविनाश! 25 करोड़ साल पहले ‘द ग्रेट डाइंग’ ने बदल दी महासागरों की दुनिया, नई रिसर्च ने खोले चौंकाने वाले राज

स्टैनफोर्ड, कैलिफोर्निया (अमेरिका)

करीब 25 करोड़ 20 लाख वर्ष पहले पृथ्वी ने अपने इतिहास के सबसे भीषण जैविक संकट का सामना किया था। इस घटना को वैज्ञानिक “द ग्रेट डाइंग” या पर्मियन-ट्रायसिक सामूहिक विलुप्ति (Permian-Triassic Mass Extinction) के नाम से जानते हैं। इस महाविनाश में पृथ्वी पर मौजूद अधिकांश समुद्री और बड़ी संख्या में स्थलीय जीव प्रजातियां समाप्त हो गई थीं। अब प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका PNAS में प्रकाशित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के नेतृत्व वाले एक नए अध्ययन ने इस घटना के पीछे छिपे कारणों पर नई रोशनी डाली है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, उस समय पृथ्वी का तापमान तेजी से बढ़ा, जिससे महासागरों का पानी असामान्य रूप से गर्म हो गया। इस बदलाव ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित किया। अध्ययन में पाया गया कि जिन जीवों का मेटाबॉलिज्म (चयापचय) धीमा था और जो सीमित परिस्थितियों में ही जीवित रह सकते थे, वे इस जलवायु परिवर्तन का सामना नहीं कर सके और बड़ी संख्या में विलुप्त हो गए। इसके विपरीत, अधिक सक्रिय और बदलते वातावरण के अनुकूल ढलने वाले जीवों के बचने की संभावना अधिक रही।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह महाविनाश केवल प्रजातियों के खत्म होने की घटना नहीं थी, बल्कि इसने महासागरों की संरचना, जैव विविधता और खाद्य श्रृंखला को भी पूरी तरह बदल दिया। आज समुद्र तटों पर दिखाई देने वाले सीप, घोंघे और मूसल्स जैसे जीवों का प्रभुत्व भी उसी महाविनाश के बाद विकसित हुए समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का परिणाम माना जाता है।

शोध में यह भी बताया गया है कि उस दौर में वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ने से समुद्र का तापमान लगातार बढ़ा। गर्म पानी में ऑक्सीजन की उपलब्धता कम होने लगी, जिससे अनेक समुद्री जीवों के लिए जीवित रहना मुश्किल हो गया। यही कारण था कि पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी सामूहिक विलुप्ति हुई, जिसमें समुद्री जीवों की अधिकांश प्रजातियां समाप्त हो गईं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन केवल अतीत की एक घटना को समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान समय के लिए भी महत्वपूर्ण चेतावनी देता है। आज वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि, समुद्र के गर्म होने और जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री जैव विविधता पर दबाव बढ़ रहा है। यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो भविष्य में समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, “द ग्रेट डाइंग” का इतिहास यह बताता है कि जलवायु में तेज बदलाव पृथ्वी पर जीवन के संतुलन को पूरी तरह बदल सकते हैं। इसलिए वर्तमान जलवायु संकट को केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि जैव विविधता और मानव भविष्य से जुड़े गंभीर वैश्विक मुद्दे के रूप में देखने की आवश्यकता है।

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