देश में मातृ स्वास्थ्य क्षेत्र में पिछले दो दशकों में निरंतर प्रगति देखी गई है। भारत ने डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ाकर माताओं और नवजात शिशुओं के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन इस प्रगति के लिए एक बड़ा चुनौती बन गया है।
मौसमी बदलाव, तापमान में वृद्धि और असामान्य वर्षा पैटर्न ने मातृ स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव बनाया है। गर्मी की लहरों से माताओं को विशेष खतरा होता है, जिससे गर्भावस्था और प्रसव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि मौजूदा स्वास्थ्य प्रणालियों को इस बदलते पर्यावरण के अनुसार ढालने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी नई प्रणाली की जरूरत नहीं है, बल्कि वर्तमान प्रणालियों को अपडेट करके इन्हें एक गर्म और अस्थिर मौसम के लिए मजबूत करना होगा। इसमें स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण, बेहतर पूर्ति और संसाधनों का संवर्द्धन शामिल है। इसके साथ ही, डिजिटल तकनीकों का उपयोग कर स्वास्थ्य निगरानी और चेतावनी तंत्र को भी सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं जिनमें माताओं और बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि रही है, लेकिन जलवायु परिवर्तन जैसी बड़ी चुनौती के लिए इन नीतियों में भी सुधार आवश्यक हो गया है। क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर कदम उठाकर प्रभावी स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित की जा सकती है।
अंततः, भारत को अपनी मातृ स्वास्थ्य प्रणालियों को पर्यावरण के बदलते स्वरूप के अनुसार संवेदनशील बनाना होगा, ताकि माताएं स्वस्थ रहें और सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित हो सके। यह न केवल स्वास्थ्य का मुद्दा है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का भी अहम पक्ष है।















