भारत में संस्थागत प्रसव, महिलाओं के सशक्तिकरण और मातृत्व कार्यक्रमों में सुधार के बावजूद, देश में केवल स्तनपान कराने की दर में गिरावट आ रही है। हाल ही में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के आंकड़े इस ओर संकेत देते हैं कि प्रसवोत्तर सहायता, कार्यस्थल सुरक्षा और मातृत्व लाभों में लगातार खामियां बरकरार हैं।
सलाहकार और पत्रकार बिंदु शजन पेरप्पादन का कहना है कि यह गिरावट चिकित्सा, सामाजिक और आर्थिक कई पहलुओं से जुड़ी है। भारत में मातृत्व से जुड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के बावजूद स्तनपान की दर कम होना चिंताजनक स्थिति दर्शाता है। NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि नवजात शिशु को जन्म के बाद छह महीने तक केवल स्तनपान कराने वाले माताओं की संख्या अपेक्षित स्तर से नीचे है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कामकाजी महिलाओं के लिए प्रसवोत्तर सहायता तथा मातृत्व अवकाश में सुधार की जरूरत है। कई माताएं काम के दबाव और कार्यस्थल की अनुकूल नीतियों की कमी के कारण स्तनपान से वंचित रहती हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं में पच्चीस प्रतिशत तक की कमी, जैसे पोस्टनाटल देखभाल में असमानता, स्तनपान कराने की दर को प्रभावित करती है।
सामाजिक कारणों में भी माताओं का पर्याप्त समर्थन न मिलना, सांस्कृतिक मान्यताएं और जागरूकता की कमी शामिल हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच इस मामले में स्पष्ट फर्क देखा गया है, जहां ग्रामीण इलाके अपेक्षाकृत ज्यादा मातृ देखभाल चुनौतियों से जूझते हैं।
सरकारी प्रयासों के बावजूद, जैसे मातृत्व लाभ योजना, जीवन स्तर में सुधार, और महिला सशक्तिकरण के कार्यक्रम, अभी भी कई बाधाएं बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्तनपान को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत बदलावों के साथ-साथ व्यापक सामाजिक जागरूकता और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता आवश्यक है।
इस विषय पर सदैव सतर्क रहने और लगातार सुधार के लिए व्यापक रणनीतियां बनाना आवश्यक है। मातृ और शिशु स्वास्थ्य ही राष्ट्र के भविष्य की नींव है, इसलिए इन सभी पहलुओं पर ध्यान देना ही भारत की मातृत्व स्वास्थ्य कहानी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगी।















