अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चाओं के बीच तेहरान ने दावा किया है कि उसने दबाव के आगे झुकने के बजाय अपनी रणनीतिक ताकत दिखाई है। ईरानी सरकार और वहां के सरकारी मीडिया इस पूरे घटनाक्रम को बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल लंबे समय से उस पर सैन्य और आर्थिक दबाव बना रहे थे, लेकिन इसके बावजूद उसने अपने रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई। अब जब बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, तो इसे ईरान अपनी जीत मान रहा है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि ईरान ने इतिहास से सीखते हुए दुनिया की बड़ी शक्तियों के सामने झुकने से इनकार किया। उनके बयान को मौजूदा वार्ता से जोड़कर देखा जा रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस समझौते को घरेलू राजनीति में बड़ी उपलब्धि के तौर पर इस्तेमाल करेगा। लंबे समय से जारी आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण सरकार पर दबाव बढ़ रहा था। ऐसे में बातचीत की शुरुआत को सरकार अपनी मजबूत विदेश नीति का परिणाम बता रही है।
यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की विशेषज्ञ एली गेरानमायेह ने कहा कि पहले अमेरिका की ओर से कठोर भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा था, लेकिन अब बातचीत पर जोर दिया जा रहा है। यह ईरान के लिए एक मनोवैज्ञानिक जीत की तरह है।
विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपनी रणनीतिक स्थिति का भी प्रभावी इस्तेमाल किया। दुनिया के तेल व्यापार के लिए यह मार्ग बेहद अहम है और यहां किसी भी तनाव का असर वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है।
हालांकि, आर्थिक मोर्चे पर ईरान अब भी चुनौतियों से जूझ रहा है। प्रतिबंधों के कारण तेल निर्यात प्रभावित हुआ है और कई उद्योगों को नुकसान पहुंचा है। जनता महंगाई और बेरोजगारी से परेशान है।
ऐसे में यदि अमेरिका के साथ समझौते से आर्थिक प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो यह ईरान के लिए राहत भरा कदम हो सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तेहरान इसे अपनी विदेश नीति की सफलता के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।















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