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CA Vs CS: चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी के बीच क्या अंतर है?

CA Vs CS: चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी के बीच क्या अंतर है?

12वीं क्लास में कॉमर्स की पढ़ाई कर रहे स्टूडेंट के बीच ये सवाल बार-बार खड़ा होता है कि उन्हें चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) बनना है या फिर कंपनी सेक्रेटरी (CS).

यहीं से ये सवाल पैदा होता है कि ये दोनों फ़ील्ड क्या हैं और इन दोनों के बीच अंतर क्या है.

जवाब है- काफ़ी अंतर है.

चार्टर्ड अकाउंटेंट बिज़नेस और फ़ाइनेंस की फ़ील्ड में काम करते हैं और उनकी ज़िम्मेदारी में ऑडिटिंग, टैक्सेशन, फ़ाइनेंशियल और जनरल मैनेजमेंट आता है.

ये एक क्वालीफ़ाइड प्रोफ़ेशनल होता है, जो फ़ाइनेंशियल मुद्दों पर एक्सपर्ट राय देते हैं.

दूसरी ओर, कंपनी सेक्रेटरी सीनियर मैनेजमेंट रोल है, जो कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए बेहद ज़रूरी होता है. ये पोज़िशन बोर्ड, शेयरधारकों और रेगुलेटर के बीच अहम कड़ी है.

इसकी ज़िम्मेदारी है लीगल कम्प्लायंस सुनिश्चित करना, स्टैचुअरी रिकॉर्ड मैनेज करना और बेस्ट प्रेक्टिस की सलाह देना.

आज हम कंपनी सेक्रेटरी की ही बात करेंगे- कंपनी सेक्रेटरी कॉरपोरेट जगत में अहम किरदार माने जाते हैं, जो कंपनी के कानूनी, प्रशासनिक और गवर्नेंस से जुड़े बड़े फ़ैसलों में भूमिका निभाते हैं.

जैसे-जैसे कॉरपोरेट सेक्टर का विस्तार हो रहा है और कंपनियों पर क़ानूनी ज़िम्मेदारियां बढ़ रही हैं, वैसे ही कुशल कंपनी सेक्रेटरी की डिमांड भी बढ़ती जा रही है. अच्छी सैलरी, करियर में स्टेबिलिटी और टॉप मैनेजमेंट के साथ काम करने का मौका – ये सभी इस प्रोफ़ेशन को ख़ास बनाते हैं.

इस करियर को चुनने के लिए एक साफ़ और तयशुदा प्रक्रिया है, जिसे इंस्टीट्यूट ऑफ़ कंपनी सेक्रेटरीज़ ऑफ़ इंडिया (ICSI) संचालित करता है.

कंपनी सेक्रेटरी करते क्या हैं?
हमारे देश में कई सारे अलग-अलग नियम-क़ानून होते हैं. मसलन, सड़क पर वाहन चलाते समय रेड लाइट आती है तो कार रोकनी है और ग्रीन पर चलानी है. नियम तोड़ने पर जुर्माने या सज़ा का प्रावधान होता है.

ऐसा ही देश में काम कर रही कंपनियों के साथ भी है, जिन्हें अपना काम जारी रखने के लिए तय क़ानूनों का पालन करना होता है.

इनमें से सबसे अहम हैं कंपनीज़ एक्ट 2013, फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट 1999 (FEMA), सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड (SEBI) के नियम और इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड.

शुभम अब्बड़ पिछले 10 सालों से सीएस के स्टूडेंट्स को पढ़ा रहे हैं.

उनका कहना है, “भारत में कारोबार सही तरीके से हो, उसके लिए नियम-क़ायदे बनाए गए हैं. हर कंपनी को मुख्य तौर पर कंपनीज़ एक्ट, 2013 को फॉलो करना होता है. लेकिन अगर कंपनी ऐसा नहीं करती, तो जुर्माना लगता है. कंपनियां, इन नियमों का पालन करें, इसके लिए भारत सरकार ने साल 1980 में कंपनी सेक्रेटरी एक्ट पास किया था. उस एक्ट के तहत एक कोर्स बनाया गया, कंपनी सेक्रेटरी. हर वो कंपनी जिसका पेड अप-शेयर कैपिटल 10 करोड़ रुपये या उससे ज़्यादा है, उसके लिए कंपनी सेक्रेटरी को अपॉइंट करना अनिवार्य है.”

पेड अप कैपिटल वह वास्तविक धनराशि होती है, जो निवेशक कंपनी के शेयर खरीदने के बदले कंपनी को चुकाते हैं.

एक कंपनी में कंप्लायंस ऑफ़िसर मुस्कान सुहाग कहती हैं, “कंपनी सेक्रेटरी वो होते हैं जिनके ज़िम्मे लीगल कंप्लायंस और गवर्नेंस होता है. जिन्हें ये पक्का करना होता है कि कोई कंपनी क़नून, नियमों के तहत काम कर रही है या नहीं. सीएस का काम सिर्फ़ रूटीन फ़ाइलिंग तक सीमित नहीं होता, बल्कि उन्हें बड़े-बड़े फ़ैसले लेने पड़ते हैं.”

वह कहती हैं, “कंपनी सेक्रटरी कॉरपोरेट रिस्ट्रक्चरिंग, फॉरेन कोलैबरेशन, जॉइंट वेंचर, आर्बिटेरेशन, फाइनेंशियल मैनेजमेंट, प्रोजेक्ट प्लानिंग, कॉरपोरेट एडवाइज़री सर्विसेज़ जैसे हर छोटे-बड़े मौके पर कंपनी की ज़रूरत होते हैं. आसान शब्दों में समझाऊं तो कंपनी लीगली, एथिकली और प्रोसीजर के हिसाब से सही से काम करें, ये ज़िम्मेदारी कंपनी सेक्रेटरी की है.”

कई बार कंपनी सेक्रेटरी की तुलना चार्टर्ड अकाउंटेंट से होती है. एक धारणा ये भी है कि जो सीए नहीं कर पाते, वो सीएस बनने का रुख़ कर लेते हैं.

हालांकि, एक्सपर्ट्स इस धारणा को सिरे से ख़ारिज करते हैं.

चार्टर्ड अकाउंटेंट से कितना अलग?

देश की कुछ सबसे मुश्किल परीक्षाओं में चार्टर्ड अकाउंटेंट की भी गिनती होती है. लेकिन जानकार कंपनी सेक्रेटरी को भी इसके बराबर ही मुश्किल बताते हैं.

मुस्कान सुहाग कहती हैं, “सीए का काम, उनका कोर एरिया अकाउंटिंग, टैक्सेशन, फ़ाइनेंशियल रिपोर्ट्स से जुड़ा होता है. वहीं, कंपनी सेक्रेटरी का कोर एरिया कंपनी लॉ, टैक्स लॉ, बिज़नेस लॉ, कंप्लायंस लॉ, ये सब होते हैं. दोनों के काम बहुत अलग होते हैं, कॉरपोरेट में दोनों प्रोफ़ेशनल का एरिया बिल्कुल अलग है.”

शुभम अब्बड़ इसी बात की तस्दीक करते हुए कहते हैं, “सीए और सीएस की तुलना करना कुछ ऐसा है जैसे कोई हड्डी के डॉक्टर और आंखों के डॉक्टर की तुलना करे. अब दोनों हैं तो डॉक्टर ही, लेकिन दोनों के एरिया एकदम अलग हैं.”

कंपनी सेक्रटरी बनते कैसे हैं?

रमनदीप सिंह सीएस और साइबर लॉयर भी हैं. वो बताते हैं कि भारत में कंपनी सेक्रेटरी बनना है तो इसके लिए कोई कॉलेज नहीं होता. बल्कि इसकी पढ़ाई करवाता है इंस्टीट्यूट ऑफ़ कंपनी सेक्रेटरीज़ ऑफ़ इंडिया यानी ICSI, जो भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आता है.

इस कोर्स को करने के लिए उम्र और न्यूनतम अंकों की ज़रूरत जैसी अनिवार्यताएं नहीं है. बारहवीं या ग्रैजुएशन में 40 फ़ीसदी अंक लाने वाले भी परीक्षा में बैठ सकते हैं.

ICSI के मुताबिक, फिलहाल इसके अलग-अलग प्रोग्राम में करीब चार लाख स्टूडेंट पढ़ रहे हैं. इसका हेडक्वॉर्टर दिल्ली में है और चेन्नई, कोलकाता, मुंबई में इसके रीजनल ऑफ़िस हैं. देश में इसके करीब 75 चैप्टर हैं.

उन्होंने बताया कि अगर कोई स्टूडेंट 12वीं के बाद कंपनी सेक्रेटरी बनना चाहता है, तो उन्हें इस कोर्स को करने के लिए तीन स्टेज पूरे करने होते हैं.

सीएस एग्ज़ीक्यूटिव एंट्रेंस टेस्ट (CSEET) (इसे पहले फ़ाउंडेशन कोर्स कहा जाता था)
एग्ज़ीक्यूटिव प्रोग्राम
प्रोफ़ेशनल प्रोग्राम

CSEET साल में तीन बार होता है – फ़रवरी, जून और अक्तूबर में. इसके अंदर चार पेपर होते हैं, जिनमें से तीन सब्जेक्टिव होते हैं और एक ऑब्जेक्टिव.

इन्हें पास करने के बाद स्टूडेंट जब सीएस एग्ज़ीक्यूटिव के अंदर आते हैं, तब उन्हें दो ग्रुप में पेपर देने होते हैं. एक ग्रुप में चार पेपर होते हैं और दूसरे में तीन.

इसके साथ ही उन्हें एक ट्रेनिंग करनी होती है, जो एक महीने की होती. ईडीईपी एग्ज़ीक्यूटिव डिवेलपमेंट प्रोग्राम. इसे आईसीएसआई ही करवाता है. लेकिन दोनों ग्रुप के पेपर एक साथ देने हैं या अलग-अलग, ये स्टूडेंट की चॉइस है. एग्ज़ीक्यूटिव में साल में दो बार जून और दिसंबर में पेपर होते हैं.

वह कहते हैं कि अलग-अलग पेपर देने का एक नुकसान है कि सीएस इंस्टीट्यूट इंडिया में टॉप 50 रैंकिंग निकालता है. ये रैंक सिर्फ़ उन्हें ही अलॉट होती है, जो दोनों ग्रुप एक साथ देते हैं.

रमनदीप के मुताबिक, सीएस एग्ज़ीक्यूटिव क्लीयर करने के बाद स्टूडेंट को 21 महीने की आर्टिकलशिप करनी ज़रूरी है, ये किसी प्रैक्टिसिंग सीएस के अंडर, किसी सीएस फर्म में, या किसी कंपनी में काम कर रहे सीएस के अंडर करनी होती है. और इसके पूरा हुए बग़ैर किसी को सीएस क्वॉलिफ़ाइड का सर्टिफ़िकेट नहीं मिलता.

आर्टिकलशिप पूरी होने और सीएस प्रोफ़ेशनल के एग्ज़ाम क्वॉलिफ़ाई करने के बाद एक महीने की ट्रेनिंग और करनी होती है, जिसका नाम है – कॉरपोरेट लर्निंग डेवलपमेंट प्रोग्राम (CLDP). ये ट्रेनिंग भी इंस्टीट्यूट ही करवाता है.

अगर स्टूडेंट किसी ग्रुप के एक भी एग्ज़ाम में फेल हुए तो फिर उन्हें पूरा ग्रुप दोबारा देना पड़ेगा.

सीएस कोर्स में कौन से सब्जेक्ट्स और कितनी फ़ीस?

मुस्कान सुहाग बताती हैं कि CSEET में चार पेपर होते हैं. वहीं, एग्ज़ीक्यूटिव प्रोग्राम में सात पेपर होते हैं, जो दो ग्रुप में बंटे होते हैं और प्रोफ़ेशनल प्रोग्राम में भी सात पेपर होते हैं, जो दो ग्रुप में बँटे होते हैं.

किसी भी स्टूडेंट को सीएस क्वॉलिफ़ाई करने के लिए CSEET, एग्ज़ीक्यूटिव और प्रोफ़ेशनल तीनों ही प्रोग्राम के हर सब्जेक्ट में कम से कम 40 प्रतिशत नंबर लाना और टोटल यानी एग्रीगेट पर्सेंटेज 50 फ़ीसदी होना ज़रूरी है.

इसके अलावा एग्ज़ीक्यूटिव प्रोग्राम की एजुकेशन फ़ीस करीब 17 हज़ार रुपए और प्रोफ़ेशनल प्रोग्राम की फ़ीस 20 हज़ार रुपए के आसपास होती है.

फ्यूचर ग्रोथ कैसी?

जानकार कहते हैं कि सीएस एक ऐसा पद है, जिसे नियुक्त करने की अनिवार्यता क़ानून में ही है. भविष्य में भी कंपनी सेक्रेटरी की डिमांड बढ़ेगी.

शुभम अब्बड़ कहते हैं, “उद्योग जगत तेज़ी से बढ़ रहा है. नए-नए नियम आ रहे हैं, क़ानून बदल रहे हैं, स्टार्टअप आ रहे हैं. ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन है, इन सब जगहों पर कंपनी सेक्रेटरी चाहिए. अभी तो नए लेबर कोड्स भी आए हैं. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल, सेबी जैसे जितने भी मंच हैं, यहां कंपनी सेक्रेटरी अपने मुवक्किल की ओर से पैरवी कर सकते हैं. इसलिए कंपनी सेक्रेटरी की मांग और उनके लिए मौके दिनोंदिन बढ़ रहे हैं.”

वहीं, मुस्कान सुहाग कहती हैं, “ये कम खर्चे में ऐसा कोर्स है, जो बढ़िया फ़्यूचर देता है. शुरुआती सैलरी ही 50 हज़ार से एक लाख रुपये के बीच होती है.”

मगर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से क्या कंपनी सेक्रेटरी की नौकरियां भी प्रभावित होंगी? अधिकतर जानकार इससे आंशिक रूप से सहमत हैं.

रमनदीप कहते हैं, “एआई का ख़तरा सीएस करने वालों को है भी और नहीं भी. बहुत सारे सीएस ऐसे हैं, जो सिर्फ़ फॉर्म फाइलिंग करते हैं, मिनट्स बनाते हैं. ये जो काम हैं, इन्हें आने वाले समय में एआई रिप्लेस कर देगा. लेकिन जो कंसलटेंसी वाले काम हैं जैसे पैसा कहां लगाना है, किसी कंपनी का मर्जर कैसे हो सकता है, या परिस्थितियों से क़ानून को जोड़ना ये सिर्फ़ सीएस ही कर सकता है कि कहां क्या नियम लगेंगे, ऐसे एनालिटिकल काम को एआई रिप्लेस नहीं कर सकता.”

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