Chhattisgarh Raipur CG

सुनील कुमार खोपरागड़े डिप्टी रेंजर और ठेकेदार के जुगलबंदी से जंगल सफारी में करोड़ों का घोटाला

नवा रायपुर जंगल सफारी/ 2011 से अटल नगर नवा रायपुर में लगभग 1200 एकड़ के वृह्द भूभाग में मानव निर्मित जंगल सफारी का निर्माण विभाग के द्वारा किया जा रहा है जिसमे सैकड़ों मजदूर दस वर्षों से ऊपर अपनी सेवाएं देते आ रहे है जिसमे कुछ श्रमिक की ड्यूटी के दौरान मृत्यु भी हुई थी जिन्हें मुआवजे के नाम पर अब तक कुछ हासिल नही हुआ उल्टे ऐसे श्रमिकों का आर्थिक मानसिक और शारीरिक दोहन भी प्रारंभ हो गया जो बड़ी निष्ठा से अपने खून पसीने से सींच कर मानव निर्मित जंगल सफारी में अपना महती योगदान दिया आज ऐसे श्रमिक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को जिनके पास सुरक्षा श्रमिक का कार्ड भी है उन्हें दरकिनार करके ऐसे कर्मचारियों को ड्यूटी पर रख लिया गया है जो अफसर एवं नेताओ के सिफारिश पर यहां अपनी ड्यूटी का निर्वहन कर रहे है यही नही ऐसे सुरक्षा श्रमिकों के छ माह के वेतन पर भी डाका डाल दिया गया वेतन मांगे जाने पर अधिकारी उन्हें उल्टा कार्य से बाहर कर अपने मन मुताबिक श्रमिकों को अधिक तवज्जो दे रहे है जिसकी वजह से अब ऐसे सुरक्षा श्रमिक अपने अधिकार एवं पारिश्रमिक के लिए अनेक उच्च अधिकारियों के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर अपनी व्यथा बता चुके है परन्तु ऐसे गड़बड़ घोटाला कर अपनी जेब गरम करने वाले संलिप्त अधिकारी श्रमिकों को दो टूक में में जवाब देकर… तुम्हे जो करना है करो… कह कर उन्हें कार्य से बाहर कर आर्थिक एवं मानसिक रूप से उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है ऐसे पीड़ित श्रमिक की संख्या एक दो नही बल्कि सैकड़ों है जिनका शोषण कर अधिकारियों के द्वारा छ माह का वेतन गबन कर डकार लिया गया है तथा इन्हें बाहर का रास्ता दिखा उनके पैसों से सुख एवं विलासता पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे है जिनमे एक अदना सा विभागीय कर्मचारी भी दो पहिया चार पहिया गाड़ी से लेकर आलीशान बंगले का मालिक बन चुका है इस संदर्भ में जंगल सफारी के रेंजर प्रभारी नदीम कृष्ण बरिहा से मोबाइल से संपर्क करने का प्रयास कर जब उनसे वस्तुस्थिति ज्ञात करने का प्रयास किया गया तब उनके द्वारा मोबाइल नही उठाया गया वही डिप्टी रेंजर एवं ज़ू प्रभारी सुनील कुमार खोपरागड़े भी सफारी में उपस्थित नही थे जबकि पीड़ित श्रमिको द्वारा बताया गया कि डिप्टी सुनील खोपरागड़े द्वारा निर्माण कार्यों में बड़ी गड़बड़ी कर लाखों करोड़ों की राशि की अफरा तफरी कर चुका है तथा उसके द्वारा ही श्रमिकों के शोषण करने के संदर्भ में यह गड़बड़ी घोटाला किए जाने की बात सामने आ रही हैं।

“अमानक स्तरहीन सरीसृप कक्ष का निर्माण”

नवनिर्मित सरिसृप कक्ष जो करोड़ो में निर्माणधीन है।

बताते चले कि इसी वर्ष 2021 में जंगल सफारी ज़ू में अतिरिक्त बाड़ा निर्माण हेतु लगभग बारह करोड की राशि प्राप्त हुई थी जिसके माध्यम से भीतर के हो रहे निर्माण कार्य को देखकर यह कतई नही लगता है कि यहां बारह करोड की बड़ी राशि व्यय की जा रही है क्योंकि जिस प्रकार जंगल सफारी जू में हो रहे निर्माण कार्य का मौका स्थल पर जाकर निरिक्षण किया गया तो होश फाख्ता हो गए जिनमे दो शौचालय,दो कक्ष, दो डायनिंग रुम 8 बाड़ा, ही निर्माण किए गए है बाड़े मे लोहे के रॉड में लिंकिंग चैन के माध्यम से पांच हजार से दस हजार फीट की परिधि को फेंसिंग किया गया है तथा वन्य प्राणियों के रखने हेतु गुफा निर्माण किए जा रहे है निर्माण कार्य मे भुरभुरे काले ईट की जुड़ाई तथा कुछ ब्लॉक में जिनमे सरीसृप प्राणियों के रहवास हेतु कांच लगाए जा रहे है इस प्रकार संपूर्ण ज़ू क्षेत्र में कुल 11 बाड़ा एवं निर्माण कार्य संपादित किए जा रहे है जिसके लिए बारह करोड़ की राशि व्यय की जा रही है अर्थात प्रत्येक निर्माण कार्य हेतु एक करोड़ दस लाख की राशि व्यय की जा रही है जबकि सांप कक्ष बनाए जाने हेतु एक वर्ष पूर्व से निर्माण कार्य करवाया जा रहा है जिसके स्तरहीन, अमानक होने की स्थिति मे सरि सृप कक्ष की छत को खंडित किया गया तो कभी दीवार मजबूती के हिसाब से दो बार खंडित किया जा चुका है बताया जाता है कि कभी छत के मध्य मे बीम नही डाला गया तो कभी कक्ष की परिधि बड़ी होने की स्थिति मे मध्य से दीवार उठाई गई इस प्रकार बार बार कक्ष का पुनरुद्धार किया जाता रहा तथा शासकीय राशि का दुरुपयोग किया जाता रहा है फिर भी अब तक सरीसृप कक्ष निर्माण नही किया जा सका है

“बिना निविदा बुलाए एक ही ठेकेदार को कार्य”

“ठेकेदार महेंद्र भारती के निर्माण संसाधन रोलर”

लगभग ग्यारह वर्षों से एक ही ठेकेदार को जंगल सफारी सहित अन्य निर्माण कार्य प्रदान करना बड़े आश्चर्य का विषय है महेंद्र भारती नामक उक्त ठेकेदार के पास बताया जाता है कि पूर्व में कुछ भी नही था आज स्थिति यह है कि उसके पास जेसीबी मशीन के साथ साथ सड़क रोलर, मिक्चर मशीन सहित अन्य निर्माण मशीनरीज के बड़े भारी भरकम संसाधन मौजूद है दो वर्ष 2011 से महेंद्र भारती नामक ठेकेदार को अनवरत निर्माण कार्य का दायित्व सौंपा जा रहा है उल्लेखनीय है कि वन अधिनियम के तहत यह सार्वजनिक है कि रेंजर अथवा डिप्टी रेंजर को 50 हजार रुपये से लेकर दो लाख रुपये मद तक का ही निर्माण सहित अन्य कार्य करवाए जाने की छूट है यदि उपरोक्त राशि से ऊपर निर्माणधीन कार्य हो तो ऐसी परिस्थिति में दैनिक समाचार पत्रों के माध्यम से निविदा बुलाना अनिवार्य होता है तथा अल्प राशि निविदाकार को विभाग द्वारा निविदा जारी की जाती है परन्तु जंगल सफारी एवं ज़ू में ऐसा किसी भी निविदा कॉल के नियमों का पालन नही किए जाने सा प्रतीत होता है यदि नियमानुसार निविदा बुलाकर टेंडर निकाला जाता तो अन्य ठेकेदार एवं सप्लायरों को कार्य प्राप्त होता परन्तु यहां केवल औपचारिक निविदा बुलाई भी गई होगी तो अपने ही चहेते ठेकेदार महेंद्र भारती को ही कार्य संपादन हेतु कार्य प्रदान कर दिया गया जो इतिहास के सुनहरे पन्नो में महेंद्र भारती के नाम से दर्ज हो गया उसके द्वारा पूर्वकालिक सत्ता से लेकर वर्तमान सत्ता तक अपने ठेकेदारी कार्यों से जन प्रतिनिधियों से लेकर अफसरशाह को प्रभावित कर उनके मध्य चर्चित है अब ठेकेदार ने उन्हें किन संसाधनों से प्रभावित किया हुआ है यह बाद का विषय है परन्तु ठेकेदार महेंद्र भारती ही एक ऐसा ठेकेदार है जिसके माध्यम से सीमेंट, रेती, ईटा, गिट्टी सहित जेसीबी, सड़क रोलर मशीन की सप्लाई भी स्वयं करता है यही नही बिल बाउचर भी अपने मन मुताबिक अधिकारियों के इशारों पर बनाकर प्रदान करता है जिसमे बड़ी राशि घोटाले की भेंट चढ़ जाती है वर्तमान ज़ू प्रभारी डिप्टी सुनील कुमार खोपरागड़े एवं महेंद्र भारती की जुगलबंदी से जंगल सफारी में अनेक गड़बड़ी, फर्जीवाड़ा एवं घोटाले के माध्यम से भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहा है यहां तक ज्ञात यह भी हुआ है कि श्रमिक भी उसके द्वारा ही लाया जा रहा है जिन्हें कलेक्टर दर से आधी रोजी में लगाया जा रहा अर्थात तीन सौ रुपये पारिश्रमिक तय है तो उसके द्वारा डेढ़ सौ रुपये दिया जाता है है तथा उनका आर्थिक शोषण किया जा रहा है।

“पारिश्रमिक के नाम बड़ा खेल”

“लाखो की राशि से शौचालय निर्माण”

पूर्व में जंगल सफारी निर्माण अथवा अन्य कार्यों में श्रमिकों को रखने की जिम्मेदारी रेंजर बरिहा एवं डिप्टी रेंजर सुनील कुमार खोपरागड़े की मिलीभगत के चलते डिप्टी के द्वारा हाजिरी से लेकर राशि वितरण की जिम्मेदारी थी परंतु जब से ऑन लाइन पेमेंट डालने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई तब से ही कुछ अपने चहेते रिश्तेदार एव मित्रों के खाता संख्या दर्ज कर राशि फर्जी तरीके से आहरित की जाने लगी जिससे बड़ी राशि की अफरा तफरी की गई ज्ञात हुआ है कि एक वर्ष पूर्व श्रमिकों के ही खाते से लगभग 21 लाख रुपये पूर्व अधिकारी को जब उनका जंगल सफारी से ट्रांसफर हुआ था बैंक से निकाल कर उन्हें दिया गया था एक वर्ष पश्चात इसी लाखों की लालच में उन्होंने अपनी नियुक्ति पुनः जंगल सफारी में करवा ली है इस प्रकार लाखों का खेल यहां हो जाता था ज्ञात तो यह भी हुआ है कि एक पढ़े लिखे श्रमिक के खाते में दो लाख ट्रांसफर हुआ तब उसे डाली गई राशि के काला एवं फर्जी धन होने की जानकारी थी तब उक्त लाखों की राशि उसके द्वारा डकार ली गई तब से ही ठोकर खाने के पश्चात डिप्टी रेंजर सुनील खोपरागड़े द्वारा ऐसे श्रमिकों के खाते में बहुत कम राशि डाला जाने लगा जो सुशिक्षित एवं जानकर थे अब नए एवं विश्वसनीय श्रमिकों के खातों के संख्या के द्वारा ही ऐसे गड़बड़ घोटाले की राशि आहरित की जा रही है वह भी ठेकेदार महेंद्र भारती के माध्यम से जो आधे पारिश्रमिक दर पर आसपास के स्थानीय ग्रामीण श्रमिकों को लाता है तथा उन्हें आधी राशि देकर आधी राशि रेंजर बरिहा, डिप्टी रेंजर सुनील कुमार खोपरागड़े, सहित अन्य कर्मचारियों के अतिरिक्त आय का मुख्य साधन बन चुका है एक प्रकार से दिए जाने वाले पारिश्रमिक से दोहरा लाभ रेंजर एवं डिप्टी रेंजर द्वारा उठाया जा रहा है यही नही ठेकेदारी प्रथा के चलते हाजिरी एवं श्रमिकों की संख्या के साथ इन्ही श्रमिकों के नामों में अपने मित्रों,रिश्तेदारों,एवं अन्य सहयोगीयों के खाता नाम संख्या दर्ज कर डिप्टी रेंजर सुनील खोपरागड़े द्वारा करवा दिया जाता है जिसका डिप्टी द्वारा अतिरिक्त लाभ प्राप्त किया जा रहा है जबकि कई श्रमिक ऐसे है जिन्हें छ माह से पारिश्रमिक प्राप्त ही नही हुआ है पारिश्रमिक मांगे जाने पर डिप्टी द्वारा उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया वही फर्जीवाड़ा में सहयोग करने वाले कई श्रमिक आज भी डिप्टी सुनील खोपरागड़े की आंख का तारा बने हुए है इस संदर्भ में अनेक श्रमिकों द्वारा उच्च अधिकारियों के समक्ष पारिश्रमिक दिए जाने की गुहार लगाई गई थी परन्तु आज तक उसका निराकारण नही किया गया यहां तक यह भी बताया जा रहा है कि कई श्रमिकों एवं कर्मचारियों के बाउचर ही गायब कर दिए गए है जबकि बताया जा रहा है कि इस संदर्भ में जब श्रमिकों द्वारा जंगल सफारी डीएफओ से चर्चा की तो उन्होंने बताया कि किसी श्रमिक का कोई पारिश्रमिक नही रुका है वही आशंका व्यक्त की जा रही है कि पारिश्रमिक के रूप में दिए जाने वाली भारी भरकम राशि जो डीएफओ के खाते में पूर्व में ही आ चुकी होती है उक्त राशि को स्वयं के निज खाते में सावधि छ माह अथवा वार्षिक अवधि के लिए जमा करा दिया गया है जिसका ब्याज ही लाखों में प्राप्त होगा संभवतः उक्त प्रक्रिया भी उच्च अधिकारियों द्वारा अपनाई जा रही है स्पष्ट करते चले कि यदि श्रमिक अपने पारिश्रमिक को लेकर तनिक भी ढिलाई बरतता है तो संपूर्ण राशि का अधिकारिक लाभ संबंधित निज खाते में सअवधि जमाकर्ता खाताधारक अधिकारी को प्राप्त होगा तब तक ऐसा अधिकारी का प्रमोशन अथवा ट्रांसफर भी संभावित है जिसकी वजह से श्रमिकों की पारिश्रमिक अब भी खतरे में अधर पड़ा हुआ है एक आई टी कार्यकर्ता द्वारा बारह सवालों को लेकर जंगल सफारी डीएफओ से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई तो डीएफओ मैडम मर्सिबेला ने कार्यालय आना ही छोड़ दिया है ऐसी चर्चा विभाग में जोरो से चल रही है।

*वन्य प्राणियों की सुरक्षा पर सवाल*

हाल ही जंगल सफारी ज़ू से दो वन्य प्राणी लोमड़ी फरार हो गई थी जिसे 36 घण्टे की मशक्कत के बाद बरामद किया गया था जिनकी सुरक्षा को लेकर भी बहुत से सवाल खड़े हुए थे क्योंकि डीएफओ द्वारा अपने विकास से जुड़े समाचार तो बताती है परन्तु जंगल सफारी के अंदर होने वाली घटना कभी बाहर नही आती जैसा कि मालूम हुआ है कि जंगल सफारी ज़ू में लगभग डेढ़ सौ से ऊपर हिरन थे जिनमें मात्र पन्द्रह से बीस हिरन ही ज़ू में मौजूद है खबर है कि मौसमी बीमारी से बड़ी संख्या में हिरण काल कल्वित हो गए राष्ट्रीय पक्षी मोर की संख्या 15 थी अब दो ही मोर बचे है बत्तख 50 से 60 की संख्या में थी बचे बीस इस प्रकार बहुत से वन्य प्राणी काल कल्वित हुए मगर उनकी संख्या को लेकर कोई खबर बाहर नही दी गई आखिर वन्य प्राणियों की हो रही मौत का जिम्मेदार कौन है? वही कहने को तो जंगल सफारी ज़ू में तीन डॉ मौजूद है वह भी इनकी नियमित जांच करते भी है अथवा नही यह भी सवाल खड़ा होता है यदि इनकी नियमित स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता तो वन्य प्राणियों की अकाल मृत्यु नही होती वही शाकाहारी,मांसाहारी वन्य प्राणियों के भोजन भी समय पर प्रदान किया जाता है इस पर अलग अलग बात सामने आ रही है क्योंकि बताया गया है कि आठ किलो मांस शेर एवं अन्य मांसाहार प्राणियों के लिए पृथक से मंगाया जाता है परन्तु शेर को ही सुबह दूध और अंडे दिए जाते है एवं एक टाइम ही आठ किलो मांस वह भी पूरा दिया जाता है या नही ? जो उसके लिए अपर्याप्त है यही वजह है कि शेर के पेट चिपके हुए है घड़ियाल मगरमच्छ के लिए चार से पांच किलो मछली दिया जाता है शाकाहारी प्राणियों को कितना घास दिया जाता है वह भी निश्चित नही है क्योंकि देसी प्रजाति के भैंस को लाकर उसके लिए अतिरिक्त राशि व्यय की जा रही है केवल एक प्रकार से वन्य प्राणीयों की खुराक में भी बड़ा खेला हो रहा है जो इनकी खुराक से मारकर अपना पेट भरा जा रहा है।

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Mazhar Iqbal

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