नई दिल्ली। भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते (BTA) पर चल रही चर्चाओं के बीच भारतीय किसान समूह फिर से सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) के प्रमुख कैथरीन टाई के बाद इस दौरे पर आए जॉन ग्रीर ने हाल ही में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ बातचीत की। इसके बाद किसानों की चिंता और गहराई है।
कृषक संगठन यह मानते हैं कि इस व्यापार समझौते से घरेलू कृषि क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वे अपनी मांगों और आशंकाओं को प्रदर्शन, रैलियों एवं सेमिनार के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। उनका कहना है कि विशेषकर बीज, खाद, और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी कृषि नीतियों में बदलाव जुड़ सकता है जो किसानों के हितों के खिलाफ है।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बैठक में दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों को सुदृढ़ बनाने पर जोर देते हुए यह आश्वासन दिया कि भारत के किसान हितों की रक्षा सर्वोपरि रहेगी। हालांकि किसानों का कहना है कि वे सरकार द्वारा लिए जा रहे कदमों पर सतर्क हैं और कोई भी निर्णय होते ही उसकी कड़ी समीक्षा करेंगे।
किसानों की प्रमुख चिंताओं में भारतीय कृषि बाजारों की खुली प्रतिस्पर्धा, अमेरिकी खपत पद्धतियों के अनुकूल कृषि उत्पादों की आवश्यकता, और इसके परिणामस्वरूप मूल्य निर्धारण पर दबाव शामिल हैं। उनका मानना है कि विदेशी प्रतिस्पर्धा में सस्ते उत्पाद आकर स्थानीय किसानों को आर्थिक नुकसान होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-अमेरिका BTA आर्थिक दृष्टि से लाभकारी साबित हो सकता है, लेकिन इसके लिए कृषि क्षेत्र की संरचनात्मक मजबूती आवश्यक है। किसानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि समझौता उनकी आर्थिक सुरक्षा को कमजोर न करे। सरकार और नीति निर्माताओं के लिए यह चुनौती है कि वे संतुलित दृष्टिकोण अपनाएं।
इसी बीच किसान संगठन आगामी दिनों में विभिन्न राज्यों में धरना प्रदर्शन एवं जनसभा आयोजित करने की योजना बना रहे हैं ताकि वे अपनी आवाज़ को मजबूती से उठाएं। यूएसटीआर ग्रीर ने अपनी बातचीत के दौरान किसानों के मुद्दों को समझने की बात कही है, पर किसानों का कहना है कि उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान प्रक्रिया में शामिल नहीं होने पर वे आंदोलन तेज करेंगे।
इस परिप्रेक्ष्य में, भारत-अमेरिका के संबंधों और कृषि क्षेत्र की स्थिरता को देखते हुए सभी पक्षों को पारदर्शी संवाद और संवेदनशीलता से कदम उठाना आवश्यक है ताकि किसान वर्ग विस्थापित न हो और आर्थिक विकास संतुलित रूप से सुनिश्चित हो सके।














