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एशिया-प्रशांत क्षेत्र में व्यापार में 2009 के बाद पहली बार गिरावट

आर्थिक विकास 18 दिसम्बर 2019

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग द्वारा बैंकाक में आयोजित सतत विकास का छठा एशिया-प्रशांत फोरम.

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (UNESCAP) ने कहा है कि अमेरिका और चीन में व्यापारिक तनाव से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और वर्ष 2019 में व्यापार में गिरावट दर्ज की गई है लेकिन 2020 में हालात बेहतर होने की उम्मीद भी जताई गई है.

वर्ष 2019 में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में व्यापार सिकुड़ा है और 2009 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद पहली बार इस क्षेत्र में व्यापार के मूल्य और मात्रा में गिरावट दर्ज की गई है. कुल निर्यात में 2.5 प्रतिशत की गिरावट आई जबकि आयात की मात्रा में 3.5 प्रतिशत की कमी देखी गई. ईरान और इंडोनेशिया जैसी तेल निर्यातक अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ जापान, सिंगापुर और हॉंगकॉंग ने निर्यात मात्रा में बड़ी गिरावट का सामना किया है.
दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी और व्यापारिक तनाव बढ़ने के कारण वर्ष 2018-2019 में उत्पाद व्यापार के मोर्चे पर भी क्षेत्र को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा.
इससे व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, ख़ासतौर से उन अर्थव्यवस्थाओं पर, जो चीन के साथ ग्लोबल वैल्यू चेन्स (जीवीसी) से जुड़ी हुई हैं.
जीवीसी के माध्यम से वैश्विक और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में छोटे व्यापारियों का एकीकरण मुश्किल होता जा रहा है. नए आयात अवरोधों के कारण उत्पादन की लागत बढ़ती है और क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क में भाग लेने वाली कंपनियों की प्रतिस्पर्धा क्षमता कम हो जाती है.
पहले अनुमान लगाया गया था कि व्यापार शुल्कों पर जारी तनातनी के कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को होने वाला नुक़सान विश्व स्तर पर 400 अरब डॉलर और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 117 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. ये आशंकाएं वास्तविकता में बदलती दिखाई दे रही हैं और अगर व्यापारिक तनाव कम करने के मौजूदा प्रयास सफल नहीं हुए तो इनके और ज़्यादा बढ़ने की आशंका है.
अमेरिका-चीन व्यापारिक तनाव-संयुक्त राष्ट्र की अवर-महासचिव अरमिदा अलीसजहबाना ने कहा, “एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चुनौती व्यापार को बढ़ाना और आर्थिक एकीकरण को मज़बूत करना है ताकि टिकाऊ विकास को सहारा दिया जा सके. वर्ष 2020 की बात करें तो, चीन और अमेरिका में समझौता स्वागतयोग्य है और इससे नीति संबंधी अनिश्चितता कम होने की उम्मीद है.”
उन्होंने भविष्य में व्यापार के विकास को बढ़ावा देने के लिए बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के महत्व को रेखांकित किया है.
चीन और अमेरिका के बीच समझौते के पहले चरण में मिली गारंटियों से निवेशकों और उपभोक्ताओं के विश्वास को बढ़ावा मिलने की संभावना है, जिससे वर्ष 2020 तक क्षेत्र में व्यापार में लगभग 1.5 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है. ये बढ़ोत्तरी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अधिक महसूस की जाएगी जहां निर्यात और आयात में क्रमशः1.9 प्रतिशत और 2.7 प्रतिशत की वृद्धि होने की उम्मीद है. हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर पूर्वानुमान अलग हैं और उनमें अनिश्चितताएं भी हैं.
भविष्य के अनुमान- वर्ष 2019 में वाणिज्यिक सेवाओं के व्यापार में इस क्षेत्र ने फिर से दुनिया के बाक़ी हिस्सों को पीछे छोड़ दिया.
लेकिन साल 2020 में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि होने की संभावना है और परिवहन सेवाओं, अन्य व्यावसायिक सेवाओं और वस्तुओं से संबंधित सेवाओं के सबसे अधिक प्रभावित होने की आशंका है.
तकनीकी विकास की मदद से सेवा क्षेत्र में, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक सेवा क्षेत्र में व्यापार की संभावनाएँ बेहतर रहने की उम्मीद जताई गई है.
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में वाणिज्यिक सेवाओं के व्यापार में अब भी गिनी-चुनी अर्थव्यवस्थाओं का ही बोलबाला है और इनमें चीन, जापान, भारत, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और हॉंगकॉंग शामिल हैं.
वाणिज्यिक सेवाओं के व्यापार के 70 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर इनका क़ब्ज़ा है.
डिजिटल प्रौद्योगिकियों से जुड़े व्यापारिक अवसरों में वृद्धि होने से व्यापारिक अवसरों पर इन्हीं अर्थव्यवस्थाओं का दबदबा बने रहने की उम्मीद है.

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