प्रशांत किशोर, भारतीय राजनीतिक रणनीतिकार और पॉलिटिकल कंसल्टेंट, बार-बार अपनी रणनीतियों और राजनीतिक समझदारी से सुर्खियों में रहते हैं। उनके बारे में एक लोकप्रिया कहावत है – ‘या तो सब या कुछ नहीं’ – जो उनके काम के प्रति समर्पण और प्रयास की तीव्रता को दर्शाती है।
प्रशांत किशोर ने पिछले कई वर्षों में कई बड़े चुनाव अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि राज्यों में भी राजनीतिक दलों को सफलतापूर्वक चुनावी रणनीति प्रदान की है। उनके अभियान कई बार पार्टी के लिए निर्णायक साबित हुए हैं, जिससे उनकी विशेषज्ञता और विश्वसनीयता और बढ़ गई है।
हालांकि राजनीतिक परिदृश्य लगातार बदल रहा है, लेकिन प्राशांत किशोर की रणनीति हमेशा नए तरीकों से चुनावी लड़ाई को लड़ने का उदाहरण रही है। वे अपने विश्लेषण में गहराई लाते हैं और डिजिटल मीडिया, जन संपर्क तथा डाटा एनालिटिक्स का प्रयोग करके चुनावी माहौल को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।
प्रशांत किशोर की विधि में मेहनत, अनुशासन और परिणामों के प्रति कड़ा रुख देखने को मिलता है। उन्होंने कई बार यह घोषणा की है कि चाहे चीजें कितनी भी कठिन क्यों न हों, वे अधूरी योजना या झूठे वादों के साथ कभी नहीं चलते। उनके लिए चुनावी रण में एकदम स्पष्ट नतीजे निहायत जरूरी हैं।
हाल ही में कुछ राजनीतिक गतिविधियों और पार्टियों के साथ प्राशांत किशोर के संबंधों को लेकर चर्चा बढ़ी है, लेकिन उन्होंने फिर भी अपने लक्ष्य को लेकर स्पष्टता बनाए रखी है। उनकी छवि एक ऐसे रणनीतिकार की है जो जोखिम उठाने से नहीं डरता और सफलता के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध रहता है।
उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े और जटिल चुनाव क्षेत्रों में उनकी रणनीतियाँ अहम साबित हुई हैं। वर्ष 2024 के आगामी चुनावों में उनकी भूमिका पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
संक्षेप में, प्रशांत किशोर का मैनट्र यह है कि राजनीतिक संघर्ष में पुरे दम-खम से लगे बिना सफलता हासिल नहीं की जा सकती। ‘या तो सब या कुछ नहीं’ उनके जीवन और कार्यशैली का मूल मंत्र है, जो उन्हें अभियान रणनीति के क्षेत्र में दूसरे रणनीतिकारों से अलग बनाता है।














