लखनऊ, 5 जून: उत्तर प्रदेश में बिजली बिलों पर मार्च माह से लागू किए जाने वाले “ईंधन और विद्युत खरीदी समायोजन अधिभार” को जून माह के बिलों में वसूलने का आदेश दिया गया है, जिसने राज्य में राजनीति और आम जनता के बीच भारी विवाद छेड़ दिया है। इस फैसले का विरोध करते हुए मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने प्रदेश की भाजपा सरकार को नाकामयाब बताया है और लगातार बढ़ रही बिजली कटौती की समस्या पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उत्तर प्रदेश विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है कि ऊर्जा की बढ़ती लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण यह अधिभार आवश्यक है ताकि वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति संतुलित बनी रहे। मंत्रालय की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि इस छूट का प्रभाव न्यूनतम रूप से उपभोक्ताओं पर पड़ेगा और इसे मार्च 2024 से लागू किया जाएगा, लेकिन बिलों में इसकी वसूली जून 2024 से शुरू होगी।
हालांकि, इस कदम का विपक्ष ने बड़े पैमाने पर विरोध किया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि सरकार की आर्थिक नीतियाँ गड़बड़ हैं और आम जनता को बिजली महंगी करने का बोझ उठाना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार उपभोक्ताओं के हितों की बजाय बड़े संगठन और राजनीतिक फायदे देख रही है।
सपा के वरिष्ठ नेताओं ने भी इस निर्णय को सरकारी असफलता का प्रमाण बताया। उनका कहना है कि लगातार हो रही बिजली कटौती से जनता पहले ही परेशान है, ऐसे में अतिरिक्त भार लगाना उचित नहीं है। उन्होंने बिजली सेवाओं में सुधार और उचित मूल्य निर्धारण की मांग दोहराई है।
विद्युत विभाग के अधिकारीयों का कहना है कि ईंधन अधिभार तकनीकी और आवश्यक संशोधन है जो पूरे देश में लागू किया जा रहा है, और उत्तर प्रदेश सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए अन्य योजनाओं पर भी काम कर रही है। उन्होंने कहा कि इस बदलाव के प्रभाव को समझाने और विवाद कम करने के लिए जनसंपर्क भी बढ़ाया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऊर्जा उत्पादन और वितरण के ढांचे में सुधार नहीं किया गया तो उपभोक्ताओं को महंगी बिजली का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से सुझाव दिया है कि इस अधिभार के साथ-साथ ऊर्जा संरक्षण और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की दिशा में भी कदम उठाए जाने चाहिए।
इस विवाद के बीच, उत्तर प्रदेश के नागरिक और उद्योग जगत इस नई अधिभार नीति का प्रभाव बारीकी से देख रहे हैं। आने वाले समय में बिजली के दामों में संभावित वृद्धि को लेकर सभी की निगाहें प्रशासन की नीतियों पर टिकी हैं।














