सरकार ने रिलायंस और बीपी से मांगे 30 अरब डॉलर, कहा- नॉन-प्रोडक्शन से हुआ नुकसान

Dec 29, 2025, भारत सरकार ने रिलायंस और बीपी के खिलाफ 30 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग की है, यह आरोप लगाते हुए कि कंपनियों ने गैस उत्पादन में कमी की है। यह मामला 2016 से एक मध्यस्थता ट्रिब्यूनल में चल रहा है। जानें पूरी कहानी।
भारत सरकार रिलायंस इंडस्ट्रीज और उसके साझेदार बीपी के खिलाफ एक मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) मामले में 30 अरब डॉलर से अधिक के मुआवजे की मांग कर रही है। सरकार का आरोप है कि कंपनियों ने कृष्णा गोदावरी बेसिन के D6 ब्लॉक में स्थित D1 और D3 नामक दो समुद्री गैस क्षेत्रों से पर्याप्त गैस का उत्पादन नहीं किया, जिससे देश को भारी नुकसान हुआ है।
मध्यस्थता की स्थिति- यह विवाद वर्ष 2016 से भारत में एक तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल के समक्ष चल रहा है। नवंबर 2024 में इसकी अंतिम सुनवाई हुई थी। ट्रिब्यूनल के मध्य वर्ष 2026 तक अपना फैसला सुनाने की उम्मीद है। हालांकि, इस फैसले को भारतीय अदालतों में चुनौती दी जा सकती है।
परियोजना का इतिहास और विवाद- D1 और D3 क्षेत्र भारत की पहली प्रमुख गहरे समुद्र की गैस परियोजना थे, जिन्हें देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए अहम माना गया था। लेकिन यह परियोजना उत्पादन में दिक्कतों, पानी घुसने और रिजर्वायर दबाव की समस्याओं, साथ ही सरकार के साथ लागत वसूली के विवादों से जूझती रही। रिलायंस ने शुरू में इन क्षेत्रों से 10.3 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस निकालने का अनुमान लगाया था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 3.1 ट्रिलियन क्यूबिक फीट कर दिया।
सरकार का तर्क- सरकार का कहना है कि कंपनियों ने खराब प्रबंधन से क्षेत्रों का अधिकांश भंडार नष्ट कर दिया। उसने आरोप लगाया है कि रिलायंस ने शुरुआती योजना के मुकाबले कम कुओं (18 बनाम 31) से गैस निकालने की ‘अत्यधिक आक्रामक’ तकनीक अपनाई, जिससे रिजर्वायर को नुकसान पहुंचा और कुल अनुमानित भंडार का केवल 20% ही उत्पादन हो पाया। सरकार इस कथित कमी के मूल्य के बराबर मुआवजा मांग रही है।
कंपनियों और सरकार का रुख- रिलायंस और बीपी ने मध्यस्थता में तर्क दिया है कि उन्हें सरकार को कुछ भी देने की जरूरत नहीं है। दोनों कंपनियों ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों ने भी इस मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह भारत सरकार द्वारा किसी कॉर्पोरेट के खिलाफ लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दावा है। इस गैस ब्लॉक को साल 2000 में भारत सरकार ने एक प्रोडक्शन शेयरिंग कांट्रैक्ट (PSC) के तहत रिलायंस को दिया था। इस अनुबंध के तहत, रिलायंस और उसके साझेदारों को सरकार के साथ मुनाफा बाँटने से पहले तेल और गैस की बिक्री से अपनी लागत वसूलने का अधिकार था। सरकार का लाभांश शुरुआत में 10% था।
















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