नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भगवान महाप्रभु जगन्नाथ पर आधारित एनिमेटेड फिल्म की रिलीज का रास्ता साफ कर दिया है। अदालत ने ओडिशा सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें फिल्म की रिलीज की अनुमति देने वाले पहले के आदेश में संशोधन की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि कला, संस्कृति और रचनात्मक अभिव्यक्ति को केवल इसलिए प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता क्योंकि कुछ लोग देवताओं के चित्रण के प्रति संवेदनशील हैं।
Highlights
- सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार की संशोधन याचिका खारिज की।
- ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ एनिमेटेड फिल्म की रिलीज का रास्ता साफ।
- कोर्ट ने कहा- कला और रचनात्मकता पर अनावश्यक रोक नहीं लगाई जा सकती।
- रथ यात्रा के बाद फिल्म रिलीज करने के पहले के आदेश को बरकरार रखा।
- एनिमेशन बच्चों तक संस्कृति और परंपरा पहुंचाने का प्रभावी माध्यम: सुप्रीम कोर्ट।
क्या है पूरा मामला?
ओडिशा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म की रिलीज पर पुनर्विचार की मांग की थी। सरकार का तर्क था कि भगवान जगन्नाथ के चित्रण को लेकर श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं, इसलिए अदालत अपने पूर्व आदेश में संशोधन करे। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने रथ यात्रा के समापन के बाद फिल्म की रिलीज की अनुमति दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि रचनात्मकता, कला और संस्कृति समाज की महत्वपूर्ण धरोहर हैं और इन्हें केवल आशंकाओं या कुछ लोगों की संवेदनशीलता के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि एनिमेशन एक रचनात्मक कला है, जिसके माध्यम से बच्चों को भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक कथाओं से सहज और रोचक तरीके से जोड़ा जा सकता है। इसलिए इस प्रकार की फिल्मों को केवल कल्पित आपत्तियों के आधार पर रोका जाना उचित नहीं है।
पहले का आदेश बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश में किसी भी प्रकार का बदलाव करने से इनकार कर दिया। अदालत ने दोहराया कि फिल्म की रिलीज रथ यात्रा के बाद होगी और इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है। इस फैसले के साथ ही ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ एनिमेटेड फिल्म के प्रदर्शन का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मक रचनात्मकता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि धार्मिक विषयों पर आधारित रचनात्मक प्रस्तुतियों का मूल्यांकन कानून के दायरे में होना चाहिए, न कि केवल संभावित विरोध या आशंकाओं के आधार पर। हालांकि यदि किसी सामग्री में कानून का उल्लंघन या जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को भड़काने का उद्देश्य पाया जाता है, तो उस पर अलग से कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
















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