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बिना वीणा की देवी सरस्वती: पल्लव और चोल युग की मूर्तियां प्राचीन प्रतिमूर्तिशास्त्र को दर्शाती हैं

Goddess Saraswati without veena: Sculptures of Pallava, Chola era reveal an earlier iconography

नई दिल्ली: देवी सरस्वती, जिन्हें ज्ञान, संगीत और कला की देवी माना जाता है, हमेशा से वीणा के साथ जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। लेकिन हाल ही में पुरातात्विक शोध और प्राचीन मूर्तियों का अध्ययन बताता है कि वीणा उनके प्रमुख प्रतीकों में से एक नहीं थी, बल्कि यह प्रतीक बाद के काल में अधिक प्रचलित हुआ। पल्लव और चोल काल की भूमिकाओं में पाए जाने वाले मूर्तिकला-संबंधित अवशेष यह संकेत देते हैं कि देवी सरस्वती की प्रतिमूर्ति प्रारंभिक रूप से वीणा के बिना बनाई जाती थीं।

प्राचीन भारत के प्रसिद्ध संगमरमर और कांस्य मूर्तिकारों ने देवी सरस्वती को विभिन्न रूपों में अंकित किया है। पल्लव युग की मूर्तियों में सरस्वती अक्सर पुस्तक, माला, कमल और अन्य प्रतीकों के साथ देखी जाती हैं, जबकि वीणा का उल्लेख बहुत कम मिलता है। चोल काल की मूर्तियों में भी वीणा प्रकट होती है, लेकिन इस दौर के प्रारंभिक हिस्सों में देवी की वीणा के बिना प्रतिमाएं भी साक्ष्य के तौर पर मौजूद हैं।

एक विशेषज्ञ पुरातत्वविद् ने बताया, “वीणा के बिना देवी सरस्वती की प्रतिमाएं इस बात की गवाही देती हैं कि उनकी स्तुति और पूजा के केंद्र में पहले और अधिक व्यापक रूप से ज्ञान, कला और संगीत से जुड़ी अवधारणाएं थीं, न कि केवल वीणा। इसके अलावा, संभवतः यह भी संकेत है कि वीणा एक प्रतीक के रूप में बाद में देवी की पहचान में सम्मिलित हुआ।”

शास्त्रीय ग्रंथों और पुरातात्विक दस्तावेजों के अध्ययन से यह भी पता चला है कि वीणा का प्रतीकात्मक उपयोग उत्तर भारत और दक्षिण भारत दोनों में अलग-अलग तरीके से विकसित हुआ। इस हिस्से की स्थानीय सांस्कृतिक और कलात्मक प्रवृतियों ने देवी के स्वरूप में विविधता लाई।

पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकार इस नई खोज को सांस्कृतिक विविधता के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि यह हमें देवी सरस्वती की पूजा-पद्धति और धार्मिक प्रतीकों के विकास की बेहतर समझ प्रदान करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आगे की खोजें हमें देवी सरस्वती से सम्बंधित और भी गहरी जानकारियां उपलब्ध करा सकती हैं।

संक्षेप में, देवी सरस्वती की वीणा के बिना प्रतिमूर्तियां यह दर्शाती हैं कि उनकी पूजा में ताकत और प्रतिष्ठा केवल वीणा तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनका स्वरूप और पहचान समय के साथ विस्तृत और विकसित होती रही। ऐसे तथ्य विज्ञान एवं संस्कृति के इतिहास में उनकी महानता को और अधिक समृद्ध करते हैं।

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