नई दिल्ली: हिंद महासागर में बढ़ते सामरिक मुकाबले के बीच भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट एक बार फिर चर्चा में है। 9 अरब डॉलर की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना को भारत की समुद्री रणनीति, व्यापारिक महत्वाकांक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना आने वाले वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका को और मजबूत कर सकती है, जबकि चीन के लिए नई रणनीतिक चुनौतियां पैदा कर सकती है।
ग्रेट निकोबार द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी सिरे पर स्थित है। इसकी खासियत यह है कि यह मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब है। यही समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों में शामिल है और एशिया से यूरोप तथा मध्य पूर्व तक जाने वाले जहाजों के लिए प्रमुख मार्ग माना जाता है।
परियोजना में क्या-क्या शामिल है?
सरकार की योजना के अनुसार ग्रेट निकोबार में एक विश्वस्तरीय अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नागरिक एवं सैन्य उपयोग वाला हवाई अड्डा, ऊर्जा अवसंरचना, पर्यटन सुविधाएं और आधुनिक टाउनशिप विकसित की जाएगी। लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह परियोजना द्वीप को एक प्रमुख समुद्री और आर्थिक केंद्र में बदलने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है।
इसका पहला चरण 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि पूरी परियोजना को विकसित होने में कई वर्ष लग सकते हैं।
चीन के लिए क्यों अहम है यह विकास?
चीन की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर समुद्री व्यापार और ऊर्जा आयात पर निर्भर है। उसका अधिकांश तेल आयात और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यही कारण है कि चीन लंबे समय से इस मार्ग पर अपनी निर्भरता को रणनीतिक जोखिम मानता रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रेट निकोबार में विकसित होने वाला बंदरगाह और सुरक्षा ढांचा भारत को इस क्षेत्र में अधिक प्रभावी निगरानी क्षमता प्रदान कर सकता है। इससे हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि भारत ने कभी भी किसी समुद्री मार्ग को बाधित करने की नीति का समर्थन नहीं किया है, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से मजबूत उपस्थिति अपने आप में एक महत्वपूर्ण कारक मानी जाती है।
भारत की अर्थव्यवस्था को क्या लाभ होगा?
वर्तमान में भारत के कई कंटेनर विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब जैसे कोलंबो और सिंगापुर के माध्यम से भेजे जाते हैं। इससे अतिरिक्त लागत और समय दोनों लगते हैं। ग्रेट निकोबार में गहरे पानी का बंदरगाह बनने के बाद बड़े जहाज सीधे भारत में रुक सकेंगे।
इससे ट्रांसशिपमेंट लागत कम होगी, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क मजबूत होगा और भारत समुद्री व्यापार से जुड़े राजस्व का बड़ा हिस्सा अपने पास रख सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को वैश्विक शिपिंग और सप्लाई चेन नेटवर्क में नई पहचान मिल सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और नौसेना के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहां विकसित होने वाला बुनियादी ढांचा समुद्री गतिविधियों की निगरानी, त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता और क्षेत्रीय उपस्थिति को मजबूत कर सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, हिंद महासागर में बढ़ती गतिविधियों के बीच भारत के लिए ऐसे रणनीतिक ठिकानों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। यह परियोजना भविष्य की सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है।
पर्यावरणीय बहस भी जारी
परियोजना को लेकर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सवाल भी उठ रहे हैं। ग्रेट निकोबार जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है और यहां कई दुर्लभ प्रजातियों के साथ आदिवासी समुदाय भी रहते हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि बड़े पैमाने पर विकास कार्यों का स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है।
सरकार का दावा है कि परियोजना को सभी पर्यावरणीय मंजूरियों और निर्धारित मानकों का पालन करते हुए लागू किया जाएगा। इसके बावजूद विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।
क्यों माना जा रहा है गेमचेंजर?
विश्लेषकों के अनुसार, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना नहीं है। यह भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत देश हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक मौजूदगी को मजबूत करना चाहता है।
यदि यह परियोजना तय लक्ष्यों के अनुसार पूरी होती है, तो आने वाले दशकों में ग्रेट निकोबार भारत के लिए एक ऐसे समुद्री केंद्र के रूप में उभर सकता है, जो व्यापार, सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव—तीनों क्षेत्रों में नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा।















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