Politics

फोन नहीं, सोशल मीडिया नहीं: कैसे ऐश्वर्या राय बच्चन ने आराध्या को दी एक अलग बचपन की सीख और माता-पिता के लिए सबक

No phone, no social media: How Aishwarya Rai Bachchan gave Aaradhya a different childhood and what parents can learn from it

मुंबई: बॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री और पूर्व मिस वर्ल्ड, ऐश्वर्या राय बच्चन ने अपनी बेटी आराध्या के बचपन को एक खास दिशा देने का फैसला किया है। उन्होंने आराध्या को सोशल मीडिया और फोन से दूर रखा है ताकि वह वास्तविक जीवन के अनुभवों पर ध्यान केंद्रित कर सके। यह कदम डिजिटल युग में बच्चों की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।

ऐश्वर्या और अभिषेक बच्चन ने मिलकर यह निर्णय लिया कि उनकी बेटी को सोशल मीडिया की जटिल दुनिया से बचाने के लिए जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। उनका मानना है कि बच्चे को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जोड़ने का सही समय तभी होता है जब वे पूरी तरह से समझदार और तैयार हों। इस दृष्टिकोण से आराध्या को तकनीकी व्यवधानों से दूर रखते हुए उसे असली दुनिया की खुशियाँ महसूस कराने पर जोर दिया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है। कम उम्र में सोशल मीडिया का अधिक प्रयोग बच्चों में तनाव, चिंता और आत्मसम्मान की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न कर सकता है। ऐश्वर्या की पेरेंटिंग शैली इस बात पर जोर देती है कि डिजिटल दुनिया की पहुँच को नियंत्रित करना आज के माता-पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

ऐश्वर्या राय बच्चन की यह सोच अन्य माता-पिता के लिए भी प्रेरणा का स्रोत साबित हो सकती है। वे अपने बच्चों के साथ अधिक वक्त बिताने, उनके मनोवैज्ञानिक विकास पर ध्यान देने और उन्हें पूरी निजता के साथ एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करने पर जोर देती हैं। इससे बच्चों का समग्र विकास होता है और वे अधिक grounded और संजीदा बनते हैं।

आज के डिजिटल युग में जहां हर चीज ऑनलाइन उपलब्ध है, बाल सुरक्षा के नए आयामों को समझना अनिवार्य हो गया है। ऐश्वर्या की इस पद्धति से यह स्पष्ट होता है कि बच्चों को तकनीक के सहारे नहीं, बल्कि प्यार, देखभाल और समय देने से ही बेहतर परिणाम मिलेंगे। आराध्या का बचपन जहां तकनीक से ज्यादा जुड़ा नहीं है, वहीं उसे अपने माता-पिता का समर्थन और मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है।

संक्षेप में कहा जाए तो ऐश्वर्या राय बच्चन ने एक संतुलित और सचेत पेरेंटिंग स्टाइल अपनाकर दिखाया है कि बच्चों को एक सफल और सुरक्षित बचपन देने के लिए डिजिटल सीमाओं का निर्धारण कितना आवश्यक है। इससे न केवल बच्चों का संरक्षण होता है, बल्कि वे खुद को बेहतर समझने और विकसित करने में सक्षम बनते हैं। यह उदाहरण आज के परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण सन्देश है।

Source

Follow us on facebook

Live Videos

Advertisements

Advertisements

Advertisements

Advertisements

Our Visitor

0820255