देश में ईथेनॉल उत्पादन को विविध कच्चे माल के आधार पर बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) के अतिरिक्त अनाज और गन्ना जूस जैसे संसाधनों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। यह विविधता न केवल ईंधन सुरक्षा को मजबूत करती है, बल्कि किसानों और उद्योग दोनों के लिए नए अवसर भी उत्पन्न करती है।
सरकार ने उच्च मिश्रण दर और नए अनुप्रयोगों के समर्थन के लिए विभिन्न नीतिगत कदम उठाए हैं, जिससे ईथेनॉल उद्योग को तीव्र विकास मिला है। पिछले कुछ वर्षों में, मक्का को प्रमुख फीडस्टॉक के रूप में अपनाया गया है, जो वर्तमान में कुल ईथेनॉल आपूर्ति में लगभग 67% हिस्सा रखता है।
एफसीआई के अधिशेष अनाज, जो आमतौर पर भंडारण क्षमता और नीति कारणों से जमा होते हैं, अब ईथेनॉल उत्पादन में उपयोग किए जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, गन्ना जूस एक पारंपरिक और स्थापित स्रोत है, जिसका योगदान भी इस मिश्रित फीडस्टॉक में अहम माना जाता है। यह विभिन्न स्रोतों के संयोजन से पर्यावरणीय स्थिरता और आर्थिक लाभ दोनों सुनिश्चित हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की समर्पित नीतियां और संयंत्रों के लिए वित्तीय प्रोत्साहन ईथेनॉल मिश्रण दर को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होंगे। इससे न केवल पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा के विकल्प भी बढ़ेंगे। उच्च मिश्रण मानक लागू करने से पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी, जिससे भारत की ऊर्जा संरचना को ज्यादा सतत बनाया जा सकेगा।
आगे की राह में, नए अनुप्रयोगों जैसे कि बायोस्ट्रिप्टिव्स और औद्योगिक उपयोगों के लिए ईथेनॉल की मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। इसलिए, सरकार और उद्योग के बीच सक्रिय सहयोग और निवेश आवश्यक होगा ताकि वैकल्पिक कच्चे माल के व्यापक उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके।
संक्षेप में, एफसीआई के अधिशेष अनाज और गन्ना जूस जैसे स्रोतों को मिलाकर ईथेनॉल उत्पादन के लिए विविध फीडस्टॉक बनाना न केवल उत्पादन लागत कम कर रहा है, बल्कि यह भारत के ऊर्जा क्षेत्र को आत्मनिर्भर और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। नीति समर्थन और तकनीकी विकास के संयोजन से यह क्षेत्र आगे और विस्तार कर सकता है।















