नई दिल्ली। आज के समय में अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत ने देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पहुंचाना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों और स्वास्थ्य संगठनों ने जोर देकर कहा है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) और उन खाद्य पदार्थों के विज्ञापन पर रोक लगाना आवश्यक हो गया है जिनमें वसा, चीनी और सोडियम की मात्रा अधिक होती है। यह कदम मधुमेह, मोटापे, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसे गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, अब तक बिना किसी सख्त नियमावली के जंक फूड कंपनियां बच्चों और युवाओं को लक्षित कर विज्ञापन करती रही हैं, जो विश्वासघातपूर्ण है। इससे न केवल बच्चों की पोषण संबंधी आदतों पर बुरा असर पड़ता है, बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएं भी उभरती हैं। इसलिए विशेषज्ञों ने सरकार से इस मामले में सख्त निर्णय लेने का आग्रह किया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी कई वर्षों से इस विषय पर चेतावनी दे रहा है कि HFSS (हाई फैट, शुगर एंड सोडियम) वाले खाद्य पदार्थों की अत्यधिक खपत सामाजिक और आर्थिक रूप से नुकसानदेह है। WHO के दिशानिर्देशों के अनुसार, ऐसे खाद्य पदार्थों का विज्ञापन विशेष रूप से बच्चों को लक्षित नहीं होना चाहिए।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए नीति निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है, ताकि जंक फूड के प्रचार-प्रसार को सीमित किया जा सके। इससे न केवल उपभोक्ताओं की जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि बाजार में स्वास्थ्यकर विकल्पों को भी बढ़ावा मिलेगा।
विशेषज्ञ बताते हैं कि अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के विज्ञापन का नियंत्रण करना सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षण में एक अहम रणनीति है। इससे मोटापे जैसी महामारी को रोकने में मदद मिलेगी, जिससे लंबी अवधि में स्वास्थ्य व्यय कम होगा। साथ ही, स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित करने में भी यह कदम सार्थक होगा।
अतः यह स्पष्ट है कि भारत में जंक फूड के फ्री विज्ञापन की छूट समाप्त करना न केवल स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है, बल्कि यह देश के समग्र स्वास्थ्य सुधार के लिए भी निर्णायक साबित होगा। सरकार और संबंधित एजेंसियों से अपेक्षा है कि वे तत्काल प्रभाव से उचित नियमावली लागू करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ और सक्रिय रह सकें।















