इंटरनेट की सबसे मशहूर शहरी कथाओं में से एक को लेकर केन पार्सन्स ने एक अद्भुत डरावनी फिल्म प्रस्तुत की है, जो देखने वालों को स्मृति और पुरानी यादों के सम्मिश्रण में एक संवेदी अनुभव प्रदान करती है। यह फिल्म दर्शकों को एक ऐसी भूलभुलैया में ले जाती है जहाँ वास्तविकता और कल्पना का मेल देखकर मन दंग रह जाता है।
केन पार्सन्स की इस फिल्म को ‘ड्रीमकोर हॉरर’ की संज्ञा दी जा सकती है, क्योंकि यह केवल डरावनी कहानी ही नहीं, बल्कि एक मानसिक और भावनात्मक यात्रा है जो दर्शकों को इंटरनेट युग की तकनीकी और सांस्कृतिक संदर्भों के साथ जोड़ती है। यह फिल्म स्मृति और पुरानी यादों के बीच एक सीमांत अवस्था का प्रदर्शन करती है, जहां समय और स्थान की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं।
फिल्म की कहानी एक ऐसे परिदृश्य पर आधारित है, जिसे ‘बैकरूम्स’ नाम दिया गया है, जो एक प्रकार का पोस्टमॉडर्न भूलभुलैया है। इसमें अनगिनत कार्यालयीन कमरों की तरह सन्नाटे और निराशाजनक माहौल दर्शाया गया है, जो मनोवैज्ञानिक त्रासदी के साथ इंटरनेट के अनंत डर को भी बखूबी दर्शाता है। फिल्म का निर्देशन, साउंड डिज़ाइन और सिनेमैटोग्राफी इसे एक मूडबोर्ड की तरह बना देते हैं जो पूरी तरह से खौफ, अतीत और वर्तमान के मिश्रण से भरा है।
इस फिल्म के माध्यम से पार्सन्स ने यह दिखाने की कोशिश की है कि इंटरनेट पर फैली अफवाहें और शहरी कथाएं कितनी गहराई से हमारे मन पर प्रभाव डालती हैं। ‘बैकरूम्स’ में महसूस होने वाला मानसिक तनाव और भ्रम इंटरनेट युग के अंतर्निहित भय को परिलक्षित करता है, जहां पहचान का नुकसान और वास्तविकता की समझ धुंधली पड़ जाती है।
फिल्म आलोचकों ने इसे इंटरनेट युग के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्पाद माना है, जो न केवल मनोरंजन करता है बल्कि दर्शकों को सोचने पर मजबूर भी करता है। फैंस के बीच यह एक पंथ क्लासिक बनने की ओर बढ़ रही है, खासकर उन लोगों के लिए जो हॉरर और साइकोलॉजिकल थ्रिलर के प्रशंसक हैं।
इस तरह के अनूठे विषय और उन्हें पेश करने का तरीका हिंदी सिनेमा के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। अगर आप इंटरनेट की अजीबोगरीब कहानियों और पोस्टमॉडर्न हॉरर के शौकीन हैं तो ‘बैकरूम्स’ निश्चित ही आपका ध्यान खींचेगी।














